सोलर इंडस्ट्री में Perovskite Solar Cells को लंबे समय से भविष्य की टेक्नोलॉजी माना जा रहा है, क्योंकि ये कम लागत में बहुत अधिक एफिशिएंसी देने की क्षमता रखते हैं। मेटल हैलाइड पेरोव्स्काइट मैटेरियल ने कुछ ही वर्षों में सिलिकॉन सोलर सेल्स की परफॉर्मेंस को टक्कर देना शुरू कर दिया था। हालांकि, इनकी एक बड़ी कमजोरी थी, जिसने इन्हें कमर्शियल स्तर पर अपनाने से रोक रखा था और वह थी कम टिकाऊपन यानी ड्यूरेबिलिटी की समस्या।

जब ये सेल्स रोशनी और ऑक्सीजन के संपर्क में आते हैं, तो इनके अंदर सुपरऑक्साइड रेडिकल्स बनते हैं, जो क्रिस्टल स्ट्रक्चर को अंदर से नुकसान पहुंचाने लगते हैं। यह डैमेज धीरे-धीरे सेल की एफिशिएंसी को कम कर देता है। अब तक वैज्ञानिक इस समस्या को बाहर से सुरक्षा देकर रोकने की कोशिश कर रहे थे, जैसे कि एन्कैप्सुलेशन या प्रोटेक्टिव लेयर लगाकर। लेकिन यह तरीका पूरी तरह सफल नहीं हो पाया, क्योंकि असली नुकसान सेल के अंदर रासायनिक स्तर पर हो रहा था।
नई केमिकल ट्रिक ने कैसे बदली पूरी तस्वीर?
चीन, मकाऊ और फ्रांस के शोधकर्ताओं की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने इस समस्या का समाधान रासायनिक स्तर पर खोज निकाला है। उन्होंने पेरोव्स्काइट सोलर सेल के अंदर एक खास केमिकल एडिटिव, जिसे “Hindered Amine Light Stabilizer” कहा जाता है, को शामिल किया। यह स्टेबलाइज़र पहले से प्लास्टिक इंडस्ट्री में धूप से होने वाले नुकसान को रोकने के लिए इस्तेमाल होता रहा है, लेकिन सोलर सेल्स में इसका उपयोग पहली बार इतने प्रभावी तरीके से किया गया है।
जब यह स्टेबलाइज़र रोशनी के संपर्क में आता है, तो यह नाइट्रॉक्सिल रेडिकल में बदल जाता है। यह नाइट्रॉक्सिल रेडिकल, सेल के अंदर बनने वाले हानिकारक सुपरऑक्साइड रेडिकल्स को तुरंत निष्क्रिय कर देता है। इस प्रक्रिया के कारण ऑर्गेनिक आयन और लेड आयोडाइड बॉन्ड्स सुरक्षित रहते हैं और स्ट्रक्चर टूटने से बच जाता है।
इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह प्रक्रिया पुनर्जीवित यानी रीजेनेरेटिव है। इसका मतलब है कि स्टेबलाइज़र खुद खत्म नहीं होता, बल्कि लगातार हानिकारक रेडिकल्स को निष्क्रिय करता रहता है। इसके अलावा यह एडिटिव पेरोव्स्काइट फिल्म में मौजूद डिफेक्ट्स को भी कम करता है, जिससे बड़े और स्मूद क्रिस्टल ग्रेन बनते हैं और ऊर्जा का नुकसान कम होता है।
26.74% एफिशिएंसी और हजारों घंटों की स्थिरता
इस केमिकल रणनीति के संयुक्त प्रभाव से शोधकर्ताओं ने 26.74% की प्रमाणित पावर कन्वर्जन एफिशिएंसी हासिल की, जो एक नया वर्ल्ड रिकॉर्ड है। यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि यह सेल्स सामान्य वातावरण यानी एंबियंट एयर कंडीशन में बनाए गए थे, जिससे इसकी प्रैक्टिकल उपयोगिता साबित होती है।
स्थिरता के परीक्षण में बिना किसी एन्कैप्सुलेशन के ये सेल्स 1,000 घंटे लगातार रोशनी में रखने के बाद भी अपनी शुरुआती एफिशिएंसी का 95% से अधिक हिस्सा बनाए रखने में सफल रहे। तुलना करें तो कई हाई-एफिशिएंसी पेरोव्स्काइट सेल्स कुछ सौ घंटों में ही प्रदर्शन खो देते हैं।
यह शोध साबित करता है कि पेरोव्स्काइट सोलर सेल्स की लाइट-इंस्टेबिलिटी कोई अटल समस्या नहीं है, बल्कि इसे रासायनिक तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है। यह तकनीक मौजूदा मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस के साथ आसानी से जोड़ी जा सकती है, जिससे बिल्डिंग-इंटीग्रेटेड सोलर पैनल्स और सिलिकॉन-पेरोव्स्काइट टैंडम मॉड्यूल्स जैसे प्रोजेक्ट्स में इसका बड़ा उपयोग संभव है। आने वाले समय में यह खोज सोलर इंडस्ट्री को एक नई दिशा दे सकती है और सस्ती, ज्यादा एफिशिएंट और टिकाऊ सोलर टेक्नोलॉजी का रास्ता खोल सकती है।
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